Monday, August 29, 2016




रतन पटेल,चित्रकूट
सदियों से हिंदुओं की आस्था का केंद्र चित्रकूट वही स्थान हैए जहाँ कभी भगवान श्रीराम ने देवी सीता और लक्ष्मणजी के साथ अपने वनवास के साढ़े ग्यारह वर्ष बिताए थे। असल में कर्वीए सीतापुरए कामताए खोही और नया गांव के आस.पास का वनक्षेत्र चित्रकूट नाम से विख्यात है। चित्रकूटए चित्र और कूट शब्दों के मेल से बना है। संस्कृत में चित्र का अर्थ है अशोक और कूट का अर्थ है शिखर या चोटी। चूंकि इस वनक्षेत्र में कभी अशोक के वृक्ष बहुतायत में मिलते थेए इसलिए इसका नाम चित्रकूट पड़ा। चित्रकूट की महत्ता का वर्णन पुराणों के प्रणेता वेद व्यासए आदिकवि कालिदासए संत तुलसीदास तथा कविवर रहीम ने भी अपनी कृतियों में किया है।
जेहि पर विपदा परत हैए सो आवत एहि देस
चित्रकूट में रमि रहे रहिमन अवध नरेस
ओरछा में राम राजा मध्य युग में लाए गए किंतु इस बुंदेलखंड के चित्रकूट में वनवास की विपत्ति काटने के लिए वे स्वयं पधारे। उनके वहाँ निवास से इस तीर्थ राज की महिमा और भी बढ़ी। अपने समस्त वांग्मय की रचना करने के उपरांत संत तुलसीदास की दृष्टि फिर फिर चित्रकूट की ओर जाती है। विनय पत्रिका में वे लिखते हैं .
अब चित चेति चित्रकूट ही चलु
भूमि बिलोकु राम पद अंकित बन बिलोकु रघुवर विहार थलु
वर्तमान में यह स्थान उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले की कर्वी तहसील तथा मध्य प्रदेश के सतना जिले की सीमा पर झाँसी.मानिकपुर रेलवे मार्ग पर स्थित है। चित्रकूट का मुख्य स्थल सीतापुर है जो कर्वी से आठ किलोमीटर की दूरी पर है। चित्रकूट के प्रमुख दर्शनीय स्थल मध्य प्रदेश के सतना जिले में ही स्थित हैं।


धार्मिक महत्त्व

यों तो चित्रकूट प्राचीनकाल से ही हमारे देश का सबसे प्रसिद्ध धार्मिक सांस्कृतिक स्थल एक महत्वपूर्ण तीर्थ रहा है लेकिन श्रीरामचंद्र जी के साढ़े ग्यारह वर्ष तक यहाँ वनवास करने से इसका महत्त्व और भी बढ़ जाता। वनवास काल में राम ने सीता और लक्ष्मण के साथ यहाँ इतनी लंबी अवधि तक निवास किया कि चित्रकूट की पग पग भूमि रामए लक्ष्मण और सीता के चरणों से अंकित है। राम ने चित्रकूट में साधनाकर शक्ति का संचय किया एवं अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष का संकल्प किया. निसिचर हीन करौं महि भुज उठाई प्रण कीन्ह। कामदगिरि जहाँ भगवान राम ने विश्राम कियाए जानकी कंड जहाँ जग जननी सीता मंदाकिनी में नित्य स्नान पूजा करती थींए स्फटिक शिला जहाँ मंदाकिनी के किनारे एक विशाल शिला पर बैठे राम ने जयंत पर बाण चलाया थाए यहीं स्थित हैं।

यहाँ सदियों से प्रवाहित मंदाकिनी नदी ;जिसे पयस्वनी गंगा भी कहा जाता हैद्ध का जल पवित्र तथा सभी पापों का नाश करने वाला कहा जाता है। चित्रकूट में दीपावली एवं रामनवमी के अवसर पर विराट मेले लगते हैं। जिनमें पाँच से दस लाख तक तीर्थ यात्री भाग लेते हैं। उत्तरी भारत का इतना बड़ा ग्रामीण मेला अन्यत्र कहीं नहीं लगता है। दीपावली के दिन हज़ारों श्रद्धालु मंदाकिनी नदी में दीपदान करते हैं। वनवास की अवधि समाप्त होने पर भगवान श्रीराम का अयोध्या में जो राज्याभिषेक हुआ था उसकी याद में चित्रकूट के लोग घी के दिये जलाकर मंदाकिनी में बाँस की टट्टियों में रखकर प्रवाहित करते हैं और लाखों दीपों की ज्योति से मंदाकिनी का प्रवाह प्रकाशित हो उठता है। कामाद्गिरि पर्वत संभतः विश्व का पहला ऐसा पर्वत है जिसकी वर्ष में लाखों तीर्थ यात्री परिक्रमा करते हैं। चित्रकूट की महत्ता के बारे में गोस्वामी तुलसीदास ने भी लिखा है कि जो व्यक्ति चित्रकूट में रहकर मंदाकिनी का जल ग्रहण कर भगवान श्रीरामचंद्र जी का जाप करता हैए उसे सहज ही परम सिद्धि प्राप्त हो जाती है।

प्राकृतिक सौंदर्य

चित्रकूट की तपोभूमि इतनी मनोहारी है कि यहाँ के पर्वतों की चोटियाँ कामद्गिरि एवं मंदाकिनी का प्रवाहए सुंदर एवं आकर्षक वन गुफ़ाएँ एवं कंदराएँ ऋषिमुनि कोल किरात सभी दर्शक का ध्यान बरबस खींच लेते हैं। यह उल्लेखनीय है कि वनवासी राम को महर्षि वाल्मीकि ने चित्रकूट निवास का परामर्ष दिया था। उनके अवतार कार्य के लिए उपयुक्त क्षेत्र होने के अतिरिक्त चित्रकूट की जलवायु एवं प्राकृतिक सौदर्य भी कुछ ऐसे हैं कि राम लक्ष्मण और सीता वनवास की लंबी अवधि वहाँ काट सके। सती अनुसूया आश्रम विशालकाय पर्वत के नीचे मंदाकिनी का शांत अविरल प्रवाहए एवं नाचते हुए मोरों के झुंड चित्त को अनायास हर लेते हैं। प्राकृतिक सुषमा से भरपूर हनुमान धाराए  देवांगना एवं कोट तीर्थ सुरम्य दर्शनीय स्थल है। गुप्त गोदावरी में विशाल पर्वत मालाओं के नीचे मीलों अंदर पोल है तथा बहुत ही सुंदर प्राकृतिक रेखांकन है। अंदर के जल प्रपात में राम लक्ष्मण व जानकी के स्नान कुंड हैं। वाल्मीकि रामायण से पता चलता है कि उस समय मंदाकिनी में कमल के पुष्प भी खिलते थे और नदी के दोनों तटों पर घने वृक्ष थे। उस समय भी मंदाकिनी में स्नान करना पुण्यदायक माना जाता है और चित्रकूट वास को शोक और विपत्तिनाशक कहा जाता था। वाल्मीकि रामायण में स्वयं भगवान राम कहते हैं कि चित्रकूट में वास करने के कारण उन्हें जरा भी वनवास का कष्ट नहीं हुआ।

दर्शनीय स्थल

चित्रकूट के मुख्य देव कामतानाथ हैं जो कामदगिरि पर्वत पर विराजमान हैंए जिनकी परिक्रमा और दर्शन करने से माना जाता है कि व्यक्ति के सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। इस पर्वत के चारों ओर पक्का परिक्रमा मार्ग बना हुआ है। मार्ग के किनारे.किनारे राम मुहल्लाए मुखारबिंदए साक्षी गोपालए भरत.मिलाप आदि कई देवालय बने हुए हैं। इसके दक्षिणी ओर एक छोटी पहाड़ी पर लक्ष्मणजी का एक मंदिर भी है। कहा जाता है कि वनवास में लक्ष्मण जी यहीं रहा करते थे। परिक्रमा मार्ग में ही भरत मिलाप स्थित है। कहा जाता है कि यहीं भरत भगवान श्री राम से मिलने आए थे। चित्रकूट का सर्वाधिक रम्य स्थल मंदाकिनी नदी के पयस्वनी तट पर मध्य प्रदेश की सीमा में स्थित जानकी कुंड है। कहा जाता है कि माता जानकी इसी कुंड में स्नान किया करती थीं। इसके आगे एक विशालखंड है जिस पर भगवान राम के चरणचिह्न अंकित हैं।

चित्रकूट से दक्षिण में लगभग १५ किलोमीटर की दूरी पर सती अनुसुइया तथा महर्षि अत्रि का आश्रम है। यहीं सती अनुसुइया और महर्षि अत्रि के साथ.साथ दत्तात्रेय व दुर्वासा व चंद्रमा आदि की मूर्तियाँ स्थापित हैं। कहा जाता है कि यहीं सती अनुसुइया ने देवी सीता को पतिव्रत धर्म का उपदेश दिया था। यहाँ से छह किलोमीटर दूर गुप्त गोदावरी नाम की एक प्राकृतिक गुफा और जानकी कुंड है। यही पर गुफा से जलधारा कुंड में गिरती है और वहीं लुप्त हो जाती है। इसलिए इसे गुप्त गोदावरी कहा जाता है।

रामघाट से पूर्व में स्थित एक पर्वतचोटी पर हनुमान जी की पवित्र मूर्ति स्थापित है। प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल पक्ष के अंतिम मंगलवार को यहाँ विशाल मेला लगता है। पर्वत के भीतर से ही एक ऐसा झरना फूट पड़ा है जिससे जिसकी जलधारा हुनमान जी की मूर्ति की बायीं भुजा पर गिरती है। यहाँ तक आने के लिए करीब ३५० सीढ़ियों को पार करना होता है। इसी पर्वत पर सीता रसोई व नरसिंह धारा भी देखने लायक हैं।


लोक संस्कृति

मनौती के बाद अपनी कामनाओं की पूर्ति होने पर जब लोग पाँच किलोमीटर की प्रदक्षिणा लेटकर करते हैं तब माताएँ मंगल गीत गाती हैं। कोल भील लोकगीत गाते हैं एवं लोक नृत्य करते हैं। दीपावली के मेले में पैर में घुँघरू बाँध मोर के पंख लगाए ढोलक मँजीरे की ताल पर अहिर नृत्य देखते ही बनता है। अहिरों की सैकड़ों टोलियाँ अपने अपने गाँव से नाच करती हुई आती हैं। चित्रकूट के मेले में इस क्षेत्र की लोक कला एवं लोकगीत खुलकर मुखरित होते हैं। ऐसा लगता है कि गोस्वामी तुलसीदास के समय तक यहाँ केवल ऋषि.मुनि या कुछ वन्य जातियाँ ही बसी थीं। तुलसी के बाद ही यहाँ मठों और मंदिरों का विकास हुआ। रामघाट के पास मंदाकिनी नदी पर पक्के घाटों का निर्माण व परिक्रमा पथ बनवाने में पन्ना नरेश अमान सिंह व श्रीहिंदूपत का काफी योगदान रहा। बाद में कई और रियासतें भी इस काम के लिए आगे आईं। सैकड़ों मठ.मंदिर व धर्मशालाएँ बनवाई गईं। यहाँ की रमणीयता और पवित्रता के कारण ही महर्षि वाल्मीकि और मुनि भारद्वाज ने श्रीराम को अपना वनवास काल यहीं बिताने की सलाह दी थी। वाल्मीकि के समय में चित्रकूट आध्यात्मिक साधना का केंद्र और ऋषियों का तपोवन था। उन्होंने स्वयं चित्रकूट पर्वत को शुभ एवं कल्याणकारी माना और लिखा है। उस समय यहाँ पर्याप्त मात्रा में कंदमूलए विभिन्न फल और शहद आदि उपलब्ध था। तरह.तरह के पक्षियों के कलरव से यह वन.क्षेत्र गूंजता रहता था। हरिणए शेर और हाथियों के झुंड स्वच्छंद विचरण करते थे। जगह.जगह ऋषियों के आश्रम थेए जहाँ वे तपस्या में लीन रहते थे।

Wednesday, July 13, 2016

क्या है कामदगिरी पर्वत का इतिहास

त्रेता युग में जब दशरथ पुत्र भगवान श्रीराम...मां सीता व भ्राता लक्ष्मण सहित 14 वर्ष के वनवास के लिए निकले...तो वाल्मीकि ऋषि से पूंछने लगे कि...साधना के लिए उत्तम स्थान कहां है...और हमे कहां निवास करना चाहिए...तो वाल्मीकि ऋषि ने कहा कि...आप तीनों चित्रकूट गिरी जाएं...वहां आपका सर्व प्रकार से कल्याण होगा...ऋषि वाल्मीकि की आज्ञा पर श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के साथ...चित्रकूट पहुंच गए...और चित्रकूट के कामदगिरी पर्वत पर निवास करने लगे...कामदगिरी पर्वत को चित्रकूट गिरी भी कहते है...ये चित्रकूट पर्वत वहीं पावन स्थल है...जहां भगवान राम ने अपने वनवास के 14 वर्ष में से 11 वर्ष बीताए थे...कहते है जब श्री राम चित्रकूट पर्वत पर निवास करते थे...तो इसी पावन स्थल पर प्रभु राम का दरबार लगता था...और श्रीराम भक्तों का कल्याण करते थे..चित्रकूट पर्वत ही वो स्थान है जहां भगवान राम ने तप कर...रावण का वध करने के लिए विशेष शक्ति को प्राप्त किया था...पर जब दशरथनंदन श्रीराम का वनवास काल समाप्त हुआ...तो श्रीराम चित्रकू़ट छोड़कर जाने लगे...तो चित्रकूट गिरी ने भगवान राम से निवेदन किया...कि हे प्रभु...आपने इतने दिनों तक यहां वास किया...जिससे ये जगह पावन हो गई...लेकिन आपके जाने के बाद कौन पूछेगा....तब श्री राम ने वरदान दिया कि...अब आप कामद हो जाएंगे...यानि ईच्छाओं की पूर्ति करने वाले हो जाएंगे..जो आपकी शरण में आएगा...उसकी सारी मनोकामना पूरी हो जाएंगी...और उस पर सदैव श्रीराम की कृपा बनी रहेगी...जैसे चित्रकूट में प्रभु राम ने अपनी कृपा का पात्र बनाया...कामदगिरी पर्वत को...और कामदगिरी पर्वत बन गया कामतानाथ...।।
नाथसम्प्रदाय की तपोस्थली है बालाजी का प्राचीन मंदिर
-पांच हजार वर्ष पूर्व हुई थी बालाजी मंदिर की स्थापना

रतन पटेल,चित्रकूट 
विंध्य पर्वत श्रंखला के मध्य मराठा नरेश बाजीराव पेशवा द्वितीय द्वारा अपने पुत्र अमृतराव पेशवा के नाम पर बसाया गया अमृत नगर वर्तमान कर्वी नाथ संम्प्रदाय की आध्यात्मिक स्थली रही है। नगर के मध्य स्थित बालाजी मंदिर नाथ सम्प्रदाय की प्राचीन आध्यात्मिक गौरव गाथा का बखान कर रहा है। नाथ संप्रदाय के इस पांच हजार वर्ष से प्राचीन आध्यात्मिक स्थल को स्वंय भगवान विष्णु के अवतार माने जाने वाले स्वामी मंच्छिद्र नाथ महाराज ने स्थापित किया था। नाथ संप्रदाय की आस्था के प्रतीक इस मंदिर में आज भी मराठी संस्कृति की स्पष्ट झलक देखने को मिलती है।  स्थानीय मराठों की मंदिर के प्रति विशेष रूचि में कमी के चलते तथा आम जनमानस में मंदिर की प्राचीन तथा आध्यात्मिक महत्व के प्रति अज्ञानता से यह प्राचीन मंदिर आज भी गुमनामी के अंधेरे में है। अब वर्तमान नाथ गुरू स्वामी मंगलनाथ महाराज इस जीर्ण हो चुके प्राचीन मंदिर का कायाकल्प करने का मन बना चुके है।
  मराठा नरेश बाजी राव पेशव द्वितीय ने वर्ष 1802 में अपने पुत्र अमृत राव पेशवा के नाम पर विन्ध पर्वत श्रंखला के मध्य वर्तमान कर्वी नगर चित्रकूट को अमृत नगर के नाम से बसाया था। भौगोलिक दृष्टि कोण से यह नगर पहले भले ही आज की तरह विकसित न रहा हो,किन्तु अध्यात्मिक दृष्टि कोण से इसका विशेष रहा है। नगर के मध्य स्थित बालाजी के मंदिर को स्वंय भगवान विष्णु का अवतार माने जाने वाले स्वामी मंच्छिद्र नाथ महाराज ने लगभग 5हजार वर्ष पूर्व एक मठ के रूप में स्थापित किया था। आध्यात्मिक शक्ति से परिपूर्ण बालाजी का यह प्राचीन मंदिर, साक्षात भगवान आदि नाथ का स्थान है। साथ ही नाथ संप्रदाय का प्रमुख केन्द्र है। मंदिर के संस्थापक स्वामी मंच्छिद्र नाथ महाराज ने इस मंदिर में एक गददी का निर्माण कराया था। जिसमें बैठकर उन्होंनें कई वर्षों तक धर्म का प्रचार प्रसार व साधना की थी। उनके पश्चात इस गदी में चौरंगी नाथ,गैनी नाथ,निवृत्ति नाथ,संत ज्ञानेश्वर नाथ,सत्यामल नाथ,गुस नाथ महिला संत,सत्यामल नाथ,गुस नाथ,परम हंस,ब्रम्हानन्द नाथ,काशी नाथ,विटठल नाथ,विश्व नाथ,माधव नाथ तथा वर्तमान में मंगल नाथ जी महाराज गादी का दायित्व संभाल रहे है। इस प्राचीन मंदिर में गादी संभालने के बाद महज 16वर्ष की उम्र में वृम्ह लीन होने वाले गुप्तनाथ जी महाराज की समाधि है। इसी समाधि के ऊपर बालाजी भगवान तथा देवी लक्ष्मी व भू देवी समेत अनेक देवताओं की अष्टधातु निर्मित प्राचीन प्रतिमायें स्थापित है। मंदिर में वर्ष प्रति पदा के शुभ दिन 26मार्च 1857 को गुप्त नाथ जी महाराज के समाधि के परिक्रमा मार्ग में माधव नाथ महाराज का जन्म हुआ था। इन्होंनें 10वर्ष की अल्पायु में गादी का दायित्व संभाला था। दया,क्षमा तथा भक्ति भाव से परिपूर्ण स्वामी माधव नाथ महाराज ने जीवन पर्यंत लोगो को भक्ति मार्ग में जोडने का काम किया। मंदिर के नये उत्तराधिकारी के रूप में दस वर्षीय माधव वेंकट रत्न पारखी उर्फ मंगल नाथ महाराज औरंगाबाद महाराष्ट्र का चयन हुआ, जिन्हें 3अप्रैल 1946को इसी मंदिर में आयोजित गादी अरोहण समारोह मंे उन्हें पीठ का उत्तराधिकारी नियुक्त किया गया है। इसके बाद करीब चार दशक तक मंदिर की सही देख रेख न हो सकी। मंदिर के उत्तराधिकारी मंगलनाथ महाराज ने अपने शिष्य औरंगाबाद निवासी कृपा शंकर तिवारी व उनकी पत्नी श्रीमती सीमा तिवारी को मंदिर की सेवा के लिये कर्वी भेजा,इन्ही के देखरेख में मंदिर का जीर्णोद्वार हुआ। इन्ही के प्रयास में काफी संख्या में मंदिर से स्थानीय लोगो का जुडाव हुआ और मंदिर में नित्य भजन कीर्तन तथा सत्संग का कार्यक्रम शुरू हुआ,जो आज भी जारी है।

Monday, July 11, 2016

पुरातत्व विभाग की उपेक्षा से खंडहर हो रहीं प्राचीन धरोहरें 

क्रासर-पर्यटन विभाग नही ले रहा ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित करने में रूचि

रतन पटेल,चित्रकूट
पतित पावनी मंदाकिनी के तट पर बसा चित्रकूट धाम देश के सबसे प्राचीन तीर्थो में से एक है। विन्ध्य पर्वत श्रृंखलाओं और वनों से घिरे इस क्षेत्र में अनेक सुरम्य पहाड़ियों के साथ -साथ ऐतिहासिक धरोहरों की भी खान है, लेकिन इन पौराणिक धरोहरों को सहेजने वाला कोई नहीं है। न तो प्रशासन ध्यान दे रहा और न सरकारें। उपेक्षा के चलते अनमोल धरोहरें खंडहर होती जा रही हैं।
प्रभु श्रीराम की तपोभूमि में प्रतिमाह लाखों श्रद्धालु रख आते हैं, लेकिन ऐतिहासिक धरोहरों की दुर्दशा को देख वे निराश होकर लौटते हैं। यदि धर्मनगरी के विशाल क्षेत्र में फैली धरोहरों को संरक्षित कर पर्यटन मानचित्र में शामिल किया जाए तो यहां पर्यटन की तादाद को और बढ़ाया जा सकता है। यहां हिंदु-मुस्लिम एकता का संदेश देने वाली मुगलकालीन बालाजी मंदिर है तो गुप्त कालीन भगवान भोले के चर सोमनाथ मंदिर सुशोभित है। खजुराहो शैली का मराठा कालीन गणेशबाग भी है जो मिनी खजुराहों के नाम से विख्यात है। इसके अलावा बाल्मीकि आश्रम लालापुर में गुप्तकालीन आशाम्बरी माता मंदिर, चंदेलकालीन मडफा का किला और मराठा कालीन तरौहा, कर्वी के किला हैं।
हैरानी की बात यह है कि सभी ऐतिहासिक व पौराणिक धरोहरें रखरखाव के अभाव में नष्ट हो रही हैं। कुछ किले तो नेस्तनाबूत होने के कगार पर हैं। उनमें मडफा, तरौंहा व कर्वी का किला प्रमुख है। मडफा का किला तो जंगल में है लेकिन जिला मुख्यालय में बने कर्वी व तरौहां के किला की देखभाल करने वाला भी कोई नहीं है। तरौंहा के किला की दीवारें ढह गई हैं जबकि कर्वी के किला में अवैध कब्जे हो गए हैं। पूर्व जिलाधिकारी जगन्नाथ के समय इस किला के पास पार्क बनवाने की योजना थी। उसका प्रस्ताव भी शासन के पास भेजा गया था। इसी के तहत किले के अंदर एक यात्री निवास भी बनाया गया था, मगर उनके जाने के बाद किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। यही हाल गणेशबाग, ऋषियन आश्रम और गोड़ा मंदिर का है। सबसे दुखद पहलू यह है कि धर्मनगरी की एक भी धरोहर उत्तर प्रदेश पुरातत्व विभाग से सरंक्षित नहीं है। इसलिए अधिकारी इस ओर ध्यान नहीं देते है। जनपद में लगभग एक दर्जन ऐतिहासिक व पैराणिक धरोहरें केंद्र सरकार के संरक्षण में दी गई हैं, पर उनका भी कोई नुमाइंदा उनकी देखरेख नहीं कर रहा है।
बुंदेलखंड के इतिहासकार प्रो. कमलेश थापक व शोधर्थी रमेश कुमार चौरसिया के मुताबिक यदि ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के साथ धर्मनगरी के पर्यटक मानचित्र में इन्हें शामिल कर लिया जाए तो सैलानी इन स्थानों को भी देखने को आएंगे। इसके यहां पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा।
पुरातत्व विभाग के असिस्टेंट कन्जर्वेटर केशव मुरारी ऐतिहासिक धरोहरों के संबंध में सिर्फ इतना कहते हैं कि उनकी ओर से देखभाल के लिए हर संभव प्रयास किया जाता है।

ये हैं ऐतिहासिक धरोहरें-

गणेश बाग (कर्वी) मराठाकालीन

ब्रिटिश कब्रगाह (कर्वी) बिट्रिश कालीन

कोठी तालाब (कर्वी) चंदेलकालीन

रामनगर मंदिर चंदेलकालीन

मऊ टैंपिल चंदेलकालीन

बरहाकोटा शिव मंदिर चंदेलकालीन

ऋषियन आश्रम चंदेलकालीन अंग्रेज की कब्र (बरगढ़) बिट्रिश कालीन

बरगढ़ मंदिर चंदेलकालीन

गोड़ा मंदिर (भरतकूप) चंदेलकालीन

मडफा किला चंदेलकालीन

सोमनाथ मंदिर (चर) गुप्त कालीन

तरौंहा किला मराठा कालीन

कर्वी किला मराठा कालीन

बालाजी मंदिर मुगलकालीन

आशाम्बरी माता मंदिर गुप्त कालीन


Sunday, May 8, 2016

पौराणिक कथाओं में चित्रकूट का कामदगिरी पर्वत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह वह स्थान है जहां भगवान श्रीराम ने अयोध्या के बाद सबसे ज्यादा समय बिताया था। यहां के साधु-संतों का मानना है कि चार धाम की यात्रा करने के बाद कामदगिरी पर्वत की परिक्रमा किए बिना मनवांछित फल की प्राप्ति नहीं होती। ऐसी मान्यता है कि 14 वर्ष के वनवास के दौरान श्रीराम ने साढे़ 11 वर्ष कामदगिरी पर्वत के घने जंगलों में ही गुजारे थे। कामदगिरी पर्वत में रहने वाले एक संत एस.गौतम ने बताया कि जब भगवान श्रीराम यहां से जाने लगे तो चित्रकूट पर्वत ने उनसे कहा, ''प्रभु आपने तो यहां वास किया है इसलिए अब यह भूमि पवित्र हो गई है लेकिन आपके जाने के बाद हमें कौन पूछेगा।'' इस पर श्रीराम ने उन्हें वरदान देते हुए कहा, ''अब आप कामद हो जाएंगे यानी इच्छाओं की पूर्ति करने वाले बन जाएंगे। जो आपकी शरण में आएगा उसकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी और उस पर हमारी भी कृपा बनी रहेगी।'' कामदगिरी पर्वत की विशेषता है कि इसके चार प्रमुख द्वार, चार अलग-अलग दिशाओं में हैं। इसके बारे में पूछे जाने पर गौतम ने बताया कि श्रीराम इन्हीं जंगलों में निवास करते थे और यहां से निकलने के लिए उत्तर, पूर्व, पश्चिम और दक्षिण में एक-एक द्वार बनाए गए थे। कामदगिरी पर्वत की परिक्रमा करने में लगभग डेढ़ घंटे का समय लगता है और इसकी पवित्रता की वजह से ही हमेशा यहां आने वाले सैलानियों की भीड़ लगी रहती है। दूर-दूर से लोग यहां अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए आते हैं। इस जंगल में हालांकि, बंदरों की संख्या बहुत ज्यादा है लेकिन ये सैलानियों को नुकसान नहीं पहुंचाते।