Wednesday, July 13, 2016

क्या है कामदगिरी पर्वत का इतिहास

त्रेता युग में जब दशरथ पुत्र भगवान श्रीराम...मां सीता व भ्राता लक्ष्मण सहित 14 वर्ष के वनवास के लिए निकले...तो वाल्मीकि ऋषि से पूंछने लगे कि...साधना के लिए उत्तम स्थान कहां है...और हमे कहां निवास करना चाहिए...तो वाल्मीकि ऋषि ने कहा कि...आप तीनों चित्रकूट गिरी जाएं...वहां आपका सर्व प्रकार से कल्याण होगा...ऋषि वाल्मीकि की आज्ञा पर श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के साथ...चित्रकूट पहुंच गए...और चित्रकूट के कामदगिरी पर्वत पर निवास करने लगे...कामदगिरी पर्वत को चित्रकूट गिरी भी कहते है...ये चित्रकूट पर्वत वहीं पावन स्थल है...जहां भगवान राम ने अपने वनवास के 14 वर्ष में से 11 वर्ष बीताए थे...कहते है जब श्री राम चित्रकूट पर्वत पर निवास करते थे...तो इसी पावन स्थल पर प्रभु राम का दरबार लगता था...और श्रीराम भक्तों का कल्याण करते थे..चित्रकूट पर्वत ही वो स्थान है जहां भगवान राम ने तप कर...रावण का वध करने के लिए विशेष शक्ति को प्राप्त किया था...पर जब दशरथनंदन श्रीराम का वनवास काल समाप्त हुआ...तो श्रीराम चित्रकू़ट छोड़कर जाने लगे...तो चित्रकूट गिरी ने भगवान राम से निवेदन किया...कि हे प्रभु...आपने इतने दिनों तक यहां वास किया...जिससे ये जगह पावन हो गई...लेकिन आपके जाने के बाद कौन पूछेगा....तब श्री राम ने वरदान दिया कि...अब आप कामद हो जाएंगे...यानि ईच्छाओं की पूर्ति करने वाले हो जाएंगे..जो आपकी शरण में आएगा...उसकी सारी मनोकामना पूरी हो जाएंगी...और उस पर सदैव श्रीराम की कृपा बनी रहेगी...जैसे चित्रकूट में प्रभु राम ने अपनी कृपा का पात्र बनाया...कामदगिरी पर्वत को...और कामदगिरी पर्वत बन गया कामतानाथ...।।

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